आदिवासी संस्कृति भारतीय समाज की अमूल्य धरोहर, प्रकृति से सह-अस्तित्व का संदेश | AARCC LIVE NEWS VARANASI
प्रकृति से सह-अस्तित्व और ‘हम’ की संस्कृति ही आदिवासी जीवन का आधार
रिपोर्ट:-आलोक चतुर्वेदी/सचिनदेव
वाराणसी, 13 अगस्त। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग की ओर से गुरुवार को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल सभागार में विश्व आदिवासी दिवस के उपलक्ष्य में संगोष्ठी एवं सांस्कृतिक उत्सव का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में आदिवासी संस्कृति, दर्शन, भाषा, प्रकृति से संबंध और समकालीन चुनौतियों पर वक्ताओं ने विचार रखे। इस अवसर पर विभिन्न सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी हुईं।
प्रसिद्ध आदिवासी चिंतक एवं कवयित्री वंदना टेटे ने कहा कि उनकी मातृभाषा खड़िया है और आदिवासी भाषाओं में ध्वनियों का भी अपना अर्थ होता है। उन्होंने कहा कि उनकी रचनाओं में केवल ‘मैं’ नहीं, बल्कि ‘हम’ की भावना है। यह ज्ञान पुरखों की वाचिक परंपरा के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ा है। आदिवासी सिद्धांत भले ही अलिखित रहे हों, लेकिन उनका पालन पीढ़ियों से होता आया है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज सहभाव और समष्टि भाव के साथ चलता है। सहसंबंध का अर्थ निर्भरता नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सम्मान और बराबरी का संबंध है। प्रकृति को सर्वोच्च नियंता बताते हुए उन्होंने कहा कि आदिवासी प्रकृतिवादी हैं और प्रकृति ही जीवन की सबसे बड़ी शिक्षक है। उन्होंने अपनी कविता ‘बेखौफ नदी’ का काव्यपाठ भी किया।
हिन्दी विभाग की विभागाध्यक्ष श्रद्धा सिंह ने कहा कि आदिवासी संस्कृति भारतीय समाज की अमूल्य धरोहर है, लेकिन इसके बावजूद आदिवासी समाज गहरे सभ्यता संकट से जूझ रहा है। देश का वास्तविक विकास तभी संभव है, जब आदिवासी शिल्प, कला और संस्कृति को मुख्यधारा में उचित स्थान मिले।
विशिष्ट वक्ता अश्विनी कुमार पंकज ने कहा कि अपनी स्वाभाविक वृत्ति को कृत्रिम बनाने से बचना होगा। औपनिवेशिकरण के कारण समाज अपनी मूल प्रवृत्तियों को भूलता जा रहा है। उन्होंने आदिवासी जीवन, स्थानीय भूगोल और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी को रेखांकित करते हुए कहा कि औपनिवेशिक दौर में आदिवासियों पर हिंसक अत्याचार भी हुए।
डॉ. ग्रेस डार्लिंग ने ‘Tribal Philosophy and Way of Life: Lessons for a Sustainable Future’ विषय पर विचार रखते हुए आदिवासी दर्शन में समानता, सामुदायिक जीवन, प्रकृति के सम्मान, सामुदायिक मूल्यों और आत्मनिर्भरता की परंपरा को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज में आर्थिक असमानता की खाई अपेक्षाकृत कम रही है।
कार्यक्रम की प्रस्तावना रखते हुए हिन्दी विभाग के सहायक आचार्य डॉ. राज कुमार मीणा ने कहा कि विश्व आदिवासी दिवस का आयोजन विभाग में पिछले तीन वर्षों से किया जा रहा है और इसमें विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। उन्होंने कहा कि आयोजन के माध्यम से आदिवासी संस्कृति के विविध रंगों को सामने लाने का प्रयास किया जाता है।
कार्यक्रम की शुरुआत परछाना संस्कृति के अनुसार अतिथियों और शिक्षकों के स्वागत से हुई। अतिथियों एवं शिक्षकों ने महामना मदन मोहन मालवीय और बिरसा मुंडा के चित्र पर पुष्प अर्पित किए। इसके बाद काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का कुलगीत गाया गया। मंचस्थ अतिथियों का पौधा एवं असमिया गमछा भेंट कर सम्मान किया गया। स्वागत वक्तव्य हारा कान्ता ने दिया। कार्यक्रम का संचालन हिन्दी विभाग की शोधार्थी काजल कुमारी ने किया।
आयोजन में प्रो. विनय कुमार सिंह, प्रो. आशीष त्रिपाठी, प्रो. प्रभाकर सिंह, प्रो. आभा गुप्ता ठाकुर, प्रो. बिपिन कुमार, प्रो. सत्यपाल शर्मा, प्रो. रामाज्ञा राय, प्रो. किंगसन सिंह पटेल, प्रो. उर्वशी गहलौत, डॉ. प्रभात कुमार मिश्र, डॉ. प्रियंका सोनकर, डॉ. रवि शंकर सोनकर, डॉ. महेन्द्र प्रसाद कुशवाहा, डॉ. अशोक कुमार ज्योति, डॉ. विन्ध्याचल यादव सहित बड़ी संख्या में शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे। कार्यक्रम में आदिवासी संस्कृति से जुड़े विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने भी आकर्षण बढ़ाया।













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