ग्रामीण संस्कृति के संरक्षण और आत्मनिर्भर ग्राम व्यवस्था पर बीएचयू में मंथन | AARCC LIVE NEWS VARANASI
"ग्रामीण भारत में सांस्कृतिक परिवर्तन" विषय पर विशेष व्याख्यान का आयोजन
रिपोर्ट:-अलोक चतुर्वेदी/सचिनदेव
शब्दन फाउंडेशन, नई दिल्ली, प्रज्ञा प्रवाह तथा पंडित दीनदयाल उपाध्याय पीठ, सामाजिक विज्ञान संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में 17 जुलाई, 2026 को "ग्रामीण भारत में सांस्कृतिक परिवर्तन" विषय पर एक विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में विभिन्न वक्ताओं ने भारतीय ग्रामीण संस्कृति, आत्मनिर्भर ग्राम व्यवस्था, अपशिष्ट प्रबंधन, सांस्कृतिक संरक्षण तथा समकालीन ग्रामीण चुनौतियों पर अपने विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम का प्रारंभ करते हुए प्रो. गुरु प्रकाश सिंह ने भारतीय एवं पाश्चात्य, विशेषकर यूरोपीय ग्रामीण जीवन की तुलनात्मक समीक्षा प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि भारत विश्व का सर्वाधिक दुग्ध उत्पादक देश है, जबकि यहाँ दुग्ध उत्पादन का आधार मुख्यतः असंगठित डेयरी प्रणाली है, जहाँ अधिकांश परिवार दो से तीन पशुओं का पालन करते हैं। उन्होंने इसे भारतीय कृषि-आधारित सभ्यता एवं सामुदायिक जीवन की विशेषता बताते हुए कहा कि इसी मॉडल ने अमूल जैसी सहकारी संस्था को वैश्विक स्तर पर स्थापित किया। इसके विपरीत अत्यधिक यंत्रीकृत यूरोपीय डेयरी व्यवस्था अपेक्षित परिणाम प्राप्त करने में अनेक चुनौतियों का सामना करती है। उन्होंने कृषि, पशुपालन एवं कुक्कुट पालन को भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था के परस्पर पूरक स्तंभ बताते हुए इनके समन्वित विकास पर बल दिया।
अपने वक्तव्य में अमोघ देव रायने *How Life's Change* अध्ययन का उल्लेख करते हुए कहा कि गाँवों को शहरों में परिवर्तित करने की निरंतर प्रवृत्ति ग्रामीण समाज के सांस्कृतिक एवं पर्यावरणीय संतुलन को प्रभावित कर रही है। उन्होंने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के क्षेत्र में हाल के विधिक एवं नीतिगत परिवर्तनों का उल्लेख करते हुए कहा कि ग्राम पंचायतों एवं स्थानीय निकायों को अपशिष्ट प्रबंधन, पुनर्चक्रण तथा कार्बन क्रेडिट जैसी अवधारणाओं के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है।
विनोबा भावे के विचार "संस्थाएँ नारायण परायण बनें" का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय समाज को प्रत्येक सामाजिक उत्तरदायित्व के लिए केवल राज्य पर निर्भर रहने के बजाय सामुदायिक सहभागिता की परंपरा को पुनर्जीवित करना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत की सांस्कृतिक विविधता उसकी सबसे बड़ी शक्ति है तथा विभिन्न क्षेत्रों की सांस्कृतिक चेतना का संरक्षण राष्ट्रीय एकता को और अधिक सुदृढ़ बनाता है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रियंक कानूनगो ने अपने संबोधन में कहा कि संस्कृति एवं सभ्यता समयानुकूल परिवर्तन के साथ ही जीवंत बनी रहती हैं। उन्होंने कहा कि मनोरंजन, रोजगार एवं अन्य सुविधाओं की तलाश में ग्रामीण जनसंख्या का शहरों की ओर पलायन गाँवों की सामाजिक संरचना को प्रभावित कर रहा है। उन्होंने प्रधानमंत्री आवास योजना तथा प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना जैसी योजनाओं को ग्रामीण क्षेत्रों में आधारभूत सुविधाओं के विस्तार और ग्राम जीवन को सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया।
उन्होंने कहा कि भारतीय गाँव ऐतिहासिक रूप से आत्मनिर्भर एवं पूर्ण सामाजिक-आर्थिक इकाइयाँ रहे हैं। अनियंत्रित शहरीकरण तथा अवैध कॉलोनियों के विस्तार ने ग्रामीण संस्कृति एवं पारंपरिक जीवन पद्धति को प्रभावित किया है। उन्होंने इस धारणा की आलोचना की कि ग्रामीण जीवन आधुनिकता के विपरीत है तथा कहा कि भारतीय गाँवों में अपशिष्ट प्रबंधन, जैविक खाद निर्माण तथा संसाधनों के पुनः उपयोग की समृद्ध परंपरा रही है। उन्होंने 'घूरा' जैसी पारंपरिक व्यवस्थाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय समाज में सतत विकास एवं पुनर्चक्रण की अवधारणा प्राचीन काल से विद्यमान रही है।
उन्होंने आगे कहा कि अत्यधिक उपभोक्तावाद, बढ़ता पूँजीवाद तथा तथाकथित विकास की अंधी दौड़ ने ग्रामीण जीवन की आत्मनिर्भरता को कमजोर किया है। जनजातीय क्षेत्रों में भी सांस्कृतिक परिवर्तन की चुनौतियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने स्थानीय परंपराओं एवं सामाजिक मूल्यों के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि आज गाँवों की बाजारों पर बढ़ती निर्भरता ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय है, जबकि पूर्व में अधिकांश आवश्यकताओं की पूर्ति स्थानीय स्तर पर ही होती थी।
श्री कानूनगो ने अपशिष्ट प्रबंधन के क्षेत्र में भारतीय परंपराओं एवं स्वदेशी ज्ञान की उपयोगिता पर बल देते हुए कहा कि इस क्षेत्र में कार्यरत लोगों को उचित आर्थिक प्रतिफल उपलब्ध कराना आवश्यक है। उन्होंने नागरिकों से प्राकृतिक संसाधनों एवं सामाजिक उत्तरदायित्वों के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान करते हुए कहा कि समाज एवं शासन, दोनों की साझा सहभागिता से ही सतत विकास का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है।
अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. तेज प्रताप सिंह,समन्वयक,पंडित दीनदयाल उपाध्याय पीठ,काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने कहा कि भारत ही नहीं, बल्कि फ्रांस, जर्मनी और इटली जैसे अनेक प्राचीन सभ्यता-सम्पन्न राष्ट्र भी अपनी सांस्कृतिक पहचान एवं परंपराओं के संरक्षण की चुनौती का सामना कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि वैश्वीकरण के इस दौर में भारतीय सभ्यता की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सांस्कृतिक निरंतरता, पारिवारिक मूल्य तथा राष्ट्रीय चेतना है।
उन्होंने भारतीय प्रवासी समुदाय का उदाहरण देते हुए कहा कि अनेक कठिन परिस्थितियों एवं प्रतिबंधों के बावजूद उन्होंने भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं को जीवित रखा। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि जब तक भारतीय समाज अपनी सांस्कृतिक विरासत, राष्ट्रीय अस्मिता एवं सामाजिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध रहेगा, तब तक भारत एक सशक्त एवं जीवंत सभ्यता के रूप में निरंतर प्रगति करता रहेगा।
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के प्राध्यापकगण, शोधार्थी, विद्यार्थी तथा विभिन्न सामाजिक एवं शैक्षणिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।











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