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एआई और भारतीय ज्ञान परंपरा के समन्वय से बनेगी भविष्य की उच्च शिक्षा, छह दिवसीय राष्ट्रीय एफडीपी का समापन | AARCC LIVE NEWS VARANASI


समतामूलक उच्च शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा और एआई के एकीकरण पर छह दिवसीय एफडीपी का समापन 

  रिपोर्ट/आलोक चतुर्वेदी/सचिन देव  

वाराणसी, 11 जून 2026। अंतर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केंद्र (आईयूसीटीई), वाराणसी एवं विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग (झारखंड) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित छह दिवसीय संकाय विकास कार्यक्रम (FDP) “समतामूलक उच्च शिक्षा: भारतीय ज्ञान परंपरा एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता का एकीकरण” का समापन गुरुवार को रामगढ़ महाविद्यालय, रामगढ़ परिसर में हुआ। कार्यक्रम में उच्च शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सुशासन और शोध की भूमिका पर व्यापक चर्चा की गई।


समापन समारोह को ऑनलाइन संबोधित करते हुए विनोबा भावे विश्वविद्यालय के कुलपति एवं कार्यक्रम के संरक्षक प्रो. चंद्रभूषण शर्मा ने कहा कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत को आगे बढ़ाने के लिए आधुनिक तकनीकों, विशेषकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता, को शीघ्र अपनाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि आज जितनी तेजी से शिक्षक और विद्यार्थी एआई आधारित तकनीकों को सीखेंगे और उसका उपयोग करेंगे, उतनी ही तेजी से वे नई उपलब्धियों तक पहुंच सकेंगे।


उन्होंने शिक्षकों से ज्ञानवर्धक लेखन, प्रभावी अध्यापन और सतत शोध कार्य पर बल देते हुए कहा कि शोध को स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं में प्रकाशित किया जाना चाहिए ताकि शिक्षा और समाज दोनों को लाभ मिल सके।

कार्यक्रम के मुख्य संसाधन व्यक्ति प्रो. आशीष श्रीवास्तव, संकाय प्रमुख (शैक्षणिक एवं शोध), आईयूसीटीई, वाराणसी ने भारतीय उच्च शिक्षा की अकादमिक संस्कृति, सुशासन और शोध की महत्ता पर विस्तृत व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी शैक्षणिक संस्थान की पहचान उसके शिक्षकों, कार्य संस्कृति, दृष्टि और मूल्यों से निर्मित होती है। बेहतर शासन का अर्थ नियंत्रण बढ़ाना नहीं, बल्कि जवाबदेही के साथ स्वायत्तता सुनिश्चित करना है।

प्रो. श्रीवास्तव ने कहा कि तकनीक मानवीय संबंधों का विकल्प नहीं बन सकती। संस्थानों को अनावश्यक औपचारिकताओं और बैठक संस्कृति से आगे बढ़कर शोध, नवाचार तथा संकाय विकास पर अधिक ध्यान केंद्रित करना चाहिए। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा, जनजातीय ज्ञान आधारित शोध तथा नेतृत्व और प्रबंधन की समन्वित भूमिका को भी रेखांकित किया।


विनोबा भावे विश्वविद्यालय के पीएम-उषा नोडल अधिकारी डॉ. अरुण कुमार मिश्रा ने अपने संबोधन में नई शिक्षा नीति (NEP) के सफल क्रियान्वयन के लिए सभी हितधारकों के सामूहिक प्रयास की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि शिक्षक, विद्यार्थी, प्रशासन और समाज के बीच बेहतर समन्वय ही शिक्षा व्यवस्था को सही दिशा प्रदान कर सकता है। उन्होंने प्रतिभागियों से कार्यक्रम में प्राप्त ज्ञान को व्यवहारिक रूप में लागू करने का आह्वान किया।

कार्यक्रम के समापन अवसर पर रामगढ़ महाविद्यालय की प्राचार्या एवं जिला समन्वयक डॉ. रत्ना पाण्डेय ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि शिक्षकों को अपने व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर विद्यार्थियों और राष्ट्र निर्माण के लिए कार्य करना चाहिए। उन्होंने कहा कि शिक्षक समाज और राष्ट्र के भविष्य के निर्माता हैं, इसलिए उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

कार्यक्रम में रामगढ़ जिले के विभिन्न महाविद्यालयों के शिक्षकों ने सक्रिय सहभागिता की और प्रशिक्षण से प्राप्त अनुभवों को उपयोगी बताया। प्रतिभागियों ने अपने फीडबैक में आईयूसीटीई, वाराणसी, विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग तथा रामगढ़ कॉलेज, रामगढ़ के प्रति आभार व्यक्त किया।

कार्यक्रम के निदेशक प्रो. आशीष श्रीवास्तव एवं प्रो. मिथिलेश कुमार सिंह (सीसीडीसी, विभावि) रहे। कार्यक्रम का समन्वयन डॉ. राजा पाठक, डॉ. दीप्ति गुप्ता तथा डॉ. अरुण कुमार मिश्रा द्वारा किया गया।


यह संकाय विकास कार्यक्रम उच्च शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता के समन्वय के माध्यम से समतामूलक एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है।





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