डॉ. राजेन्द्र प्रसाद पाण्डेय के चिंतन और साहित्यिक विरासत पर राष्ट्रीय संगोष्ठी में गहन मंथन | AARCC LIVE NEWS VARANASI
रिपोर्ट:-आलोक चतुर्वेदी/सचिनदेव
साहित्य समाज की संवेदना को ज्ञानात्मक रूप में स्थापित करने का सशक्त माध्यम : वक्ता
वाराणसी। नान्दी सेवा न्यास द्वारा आयोजित द्विदिवसीय "डॉ. राजेन्द्र प्रसाद पाण्डेय स्मृति समारोह सह पांचवीं राष्ट्रीय संगोष्ठी" का गुरुवार को भव्य शुभारंभ हुआ। वैदिक मंत्रोच्चार, दीप प्रज्ज्वलन एवं डॉ. राजेन्द्र प्रसाद पाण्डेय की प्रतिमा पर माल्यार्पण के साथ शुरू हुए समारोह में देशभर से आए साहित्यकारों, शिक्षाविदों और शोधकर्ताओं ने उनके साहित्य, चिंतन और सांस्कृतिक अवदान पर विस्तार से विचार व्यक्त किए।
उद्घाटन सत्र में शांभव एवं वैष्णव रत्न ने अपने दादा डॉ. राजेन्द्र प्रसाद पाण्डेय द्वारा रचित 'कर्मविमर्श:' का सस्वर पाठ किया। स्वागत भाषण में प्रो. शशिकला पाण्डेय ने बताया कि दो दिवसीय संगोष्ठी का केंद्रीय विषय "डॉ. राजेन्द्र प्रसाद पाण्डेय : चिंतन एवं संवेदना" है, जिसके विभिन्न आयामों पर अकादमिक सत्रों में चर्चा की जाएगी।
इस अवसर पर डॉ. राजेन्द्र प्रसाद पाण्डेय कृत ‘जीवनचिन्तनम्’, प्रो. शशिकला पाण्डेय द्वारा संपादित ‘होना विद्यानिवास मिश्र’, ‘मेरे साक्षात्कार’, साहित्यकार बलराम की ‘संपूर्ण कहानियां’ तथा ‘नान्दी’ पत्रिका का लोकार्पण किया गया। पुस्तकों का परिचय वरिष्ठ साहित्यकार बलराम ने प्रस्तुत किया।
बीज वक्तव्य में प्रो. चितरंजन मिश्र ने कहा कि डॉ. पाण्डेय प्रशासनिक व्यस्तताओं के बावजूद एक संवेदनशील सर्जक के रूप में सदैव सक्रिय रहे। वे ज्ञानात्मक संवेदना और संवेदनात्मक ज्ञानबोध के समर्थक थे तथा आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलित दृष्टि रखते थे। डॉ. अत्रि भारद्वाज ने उन्हें लोक और शास्त्र का अद्भुत व्याख्याकार बताते हुए कहा कि परदुःखकातरता उनके साहित्य का मूल स्वर रही है।
साहित्य अकादमी के अध्यक्ष माधव कौशिक ने कहा कि डॉ. पाण्डेय किसी विचारधारा के आग्रह से मुक्त रहकर भारतीय परंपरा की नई व्याख्याएं प्रस्तुत करते रहे। उनके साहित्य में भारतीयता की वास्तविक आत्मा विद्यमान है। मुख्य अतिथि एवं संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि डॉ. पाण्डेय केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचार हैं, जिनकी रचनाओं में भारतीय संस्कृति की मजबूत नींव दिखाई देती है।
काव्य संसार पर केंद्रित रहा पहला वैचारिक सत्र
‘डॉ. राजेन्द्र प्रसाद पाण्डेय का काव्य संसार’ विषय पर आयोजित प्रथम वैचारिक सत्र में वक्ताओं ने उनकी कविताओं में अभिव्यक्त मानवीय संवेदनाओं, स्त्री विमर्श, पारिवारिक मूल्यों और पर्यावरण चेतना पर चर्चा की। डॉ. प्रभात मिश्र, दिलीप कुमार शर्मा, फारुक अफरीदी, डॉ. मुक्ता और प्रो. प्रभाकर सिंह ने विभिन्न कविता संग्रहों के माध्यम से उनकी रचनात्मक दृष्टि का विश्लेषण किया।
अध्यक्षीय टिप्पणी में प्रो. वशिष्ठ अनूप ने कहा कि डॉ. पाण्डेय अपनी कविताओं के माध्यम से टूटते सामाजिक और पारिवारिक संबंधों को बचाने का प्रयास करते हैं। उन्होंने भारतीय लोक परंपरा, संस्कृत साहित्य और कालिदास-भवभूति के संदर्भों के माध्यम से विषय को विस्तार दिया।
कथा साहित्य में ग्रामीण संवेदना का जीवंत चित्रण
द्वितीय अकादमिक सत्र ‘राजेन्द्र प्रसाद पाण्डेय का कथा संसार’ विषय पर आयोजित हुआ। वक्ताओं ने उनके उपन्यास ‘गाँव बेगाँव’ और कहानी संग्रह ‘फरिश्ते’ के माध्यम से ग्रामीण जीवन, लोक संस्कृति और मानवीय संघर्षों के चित्रण को रेखांकित किया। अध्यक्षता करते हुए प्रो. बलिराज पाण्डेय ने उन्हें समाज और संस्कृति का संवेदनशील रचनाकार बताया।
हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों पर भी हुई चर्चा
तृतीय अकादमिक सत्र का विषय ‘हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष : काशी और नान्दी’ रहा। मुख्य वक्ता डॉ. राजकुमार उपाध्याय ‘मणि’ ने हिंदी पत्रकारिता के विकास में काशी की भूमिका और ‘नान्दी’ पत्रिका के योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि साहित्य और पत्रकारिता एक-दूसरे के पूरक हैं तथा दोनों समाज को दिशा देने का कार्य करते हैं।
अध्यक्षीय वक्तव्य में व्योमेश शुक्ल ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता का विकास साहित्यिक चेतना से जुड़ा रहा है। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी और आचार्य रामचंद्र शुक्ल जैसे साहित्यकारों ने संपादन के माध्यम से हिंदी समाज को नई दृष्टि प्रदान की।
कार्यक्रम में देश-विदेश से आए विद्वानों, शोधार्थियों और साहित्य प्रेमियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। नान्दी सेवा न्यास के सचिव यशोरत्न पाण्डेय ने अतिथियों का स्वागत किया, जबकि संगोष्ठी की जानकारी संयोजक डॉ. राजकुमार उपाध्याय ‘मणि’ ने दी।










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